इतनी तो मोहब्बत होती नहीं,
मैं और मोहब्बत कैसे करूं
हर बार वही जज़्बात उठे,
अब फिर से चाहत कैसे करूं
जिस दिल को खुद तक छोड़ दिया,
उससे अब राहत कैसे करूं
ख़्वाबों में जो बसी है सदा,
उसको ही बिसरात कैसे करूं
हर मोड़ पे आवाज़ वो दे,
मैं उसकी इनक़ारत कैसे करूं
तेरे बाद न कोई अपना लगा,
अब ताज़ा शरारत कैसे करूं
थक कर भी तुझ तक आता हूं,
फिर खुद से बगावत कैसे करूं
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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