तौहीन भी थी, तौसीफ़ भी थी
उसकी ख़ामोशी में तीफ़ भी थी
हर बार उसी को दिल ने चुना,
जो मेरी हस्ती से ख़लफ़ भी थी
बचपन में जो साए थे अंदर,
वो अब तसव्वुर में मेहफ़िल भी थी
हम जो उसे समझते रहे ‘इश्क़’,
शायद कोई आदत-ए-ख़ुद भी थी
आईने से डरना तब शुरू हुआ,
जब शक्ल में थोड़ी शबीह भी थी
ख़ुशबू जो हर ज़ख़्म से उठी,
वो मेरी ज़हन की तारीक़ भी थी
दर्द का होना भी एक तरह का सुकून है,
कमाल ये है कि तासीर भी थी
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
| तौहीन (Tauheen) | अपमान, बेइज़्ज़ती |
| तौसीफ़ (Tauseef) | प्रशंसा, तारीफ़ |
| तीफ़ (Teef) | चुभन, हल्की-सी चोट या असर (mostly poetic metaphor for subtle pain) |
| हस्ती (Hasti) | अस्तित्व, वजूद |
| ख़लफ़ (Khilāf) | विरोध, विरुद्ध |
| साए (Saaye) | साये, छाया, परछाई (यहाँ: बचपन की यादें या प्रभाव) |
| तसव्वुर (Tasavvur) | कल्पना, सोच, ध्यान में लाना |
| मेहफ़िल (Mehfil) | सभा, जमावड़ा, भावनात्मक/सांस्कृतिक माहौल |
| आदत-ए-ख़ुद | स्वयं की आदत (अपनी ही मानसिक आदतें या पैटर्न) |
| शबीह (Shabih) | समानता, मिलती-जुलती शक्ल या छवि |
| ज़हन (Zehn) | मन, मस्तिष्क, चेतना |
| तारीक़ (Tareeq) | अंधकारमय, गहराई से भरा हुआ अँधेरा (यहाँ: मानसिक अंधकार) |
| तासीर (Taseer) | प्रभाव, असर (विशेषकर भावनात्मक या दवा जैसे प्रभाव) |
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