तेरा नाम लबों पर लाना अच्छा लगता है
ख़ुद से बातें कर के बहलाना अच्छा लगता है

तन्हा रातें जब ख़्वाब नहीं आने देतीं
चुपके से दर्द छुपा जाना अच्छा लगता है

उससे मिलना अब मुमकिन तो नहीं शायद
पर हर मोड़ पे रुक जाना अच्छा लगता है

कुछ रंज हैं, कुछ यादें हैं, कुछ क़समें भी
इन सबको दिल में बसाना अच्छा लगता है

कब छोड़ा था चाहा जाना, जाने वाले को?
अब भी उसको समझाना अच्छा लगता है

वो जो ख़त कभी आधे में रह गए थे लिखे,
अब भी कभी-कभी दोहराना अच्छा लगता है

कुछ सवाल अधूरे हैं उसकी आँखों में,
उनको ख़ामोशी से पढ़ जाना अच्छा लगता है

भीड़ में जब कोई उसकी तरह मुस्काए,
दिल को थोड़ा बहकाना अच्छा लगता है

वक़्त भले ही आगे बढ़ता जाए, मगर
कुछ लम्हों को थामे रह जाना अच्छा लगता है

हर बार उसे भूलने की कोशिश की,
पर फिर उसका हो जाना अच्छा लगता है

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

2 responses to “बे-नाम सा इक रिश्ता”

  1. बेहतरीन 👌

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    1. धन्यवाद!

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?