नूर का पर्दा

बदलते वक़्त में चेहरा तमाम किस का था
ये आईना जो दिखाए वो नाम किस का था

हर एक लफ़्ज़ पे साया किसी का लगता था
सुनाई दे न सका जो कलाम किस का था

न जिस्म था, न जगह, न कोई ख़्वाब कोई
जो दिख रहा था मुझे, वो सुरूर किस का था

मैं अपने आप से पूछूँ तो दिल नहीं बोलें
जो सोच दिल में थी गहरी वो जाम किस का था

वो चल रहा था मगर पाँव मेरे कांप रहे
क़दम-क़दम पे ये साया तमाम किस का था

न था मैं खुद में मगर हर तरफ़ मेरी सदा
ये तिश्नगी, ये सवाल-ओ-पयाम किस का था

न कोई वक़्त, न मंज़िल, न रास्ता मालूम
जो साथ चलता रहा, वो सफ़र किस का था

हर एक रंग में छुप के वो ज़ाहिर हो जाता
जो बे-हिजाब था, वो पर्दा-ए-नूर किस का था

मैं सोचता रहा कि कौन था वो शख़्स
जो रह गया था मिरे बाद, असर किस का था

मुझे ही मेरा पता अब नहीं रहा ‘मानव’
जो गुमशुदा था वो पहचान किस का था

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


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