सफ़र में उठती रही एक अजब-सी लहर बिना नक़्शे
कदम तलाशते रहे अपना नया शहर बिना नक़्शे
ख़बर न कल की, न कोई हद-ए-दीवार बची कहीं
हमने गढ़ा है हर आनेवाले पे सदा असर बिना नक़्शे
नज़र ने तोड़ दिया दिशाओं का हर क़फ़स
उड़ी है फ़िक्र की परिन्दगी, खुली नज़र बिना नक़्शे
लफ़्ज़ अब डिजिटल सियाही में तैरते हुए
काग़ज़ को मिल रहा है चमकता सफ़र बिना नक़्शे
मैंने अपनी ही मिट्टी से पूछा है नया पता
ज़मीन देती गई मुझे अलग-सा बसर बिना नक़्शे
सितारों से जुड़ा वाई-फ़ाई की नाज़ुक लकीर तक
छतों पे बैठा गिनता हूँ आसमान के शजर बिना नक़्शे
जो दिल के डेटा में क़ैद थे पुराने फ़ोल्डर
डिलीट कर के बनाया है ताज़ा ख़ज़ाना-ए-ज़र बिना नक़्शे
मक़्ता
“मानव” कई नक़्क़ाशों के दरमियाँ भी तन्हा रहा
मैंने उकेरा है ख़ुद को मगर-ए-दिगर बिना नक़्शे
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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