मंगलाचरण दोहा
श्री गणपति गुरु वंदना, करउँ मनोहर ध्यान।
दुर्गा चरन सरन गहि, मिटें सकल दुःख-बलिहान॥
दुर्गा चालीसा (चौपाइयाँ)
जय जगदंबा मंगल दाता, शक्तिरूप हे माँ सुखकाता।
नवदुर्गा के रूप अनोखे, स्तुति करुँ तन-मन सब रोखे॥
शैलपुत्री रूप तुमहारे, पाप-ताप हर लो दुर्दिन सारे।
चिंता-शंका हों सब दूर, दुश्मन के बल भी तुम हारे॥
ब्रह्मचारिणी रूप सुहावन, जप-तप योग कराएँ पावन।
मन की वासन बिनसत जाई, शुद्धि मिले बुद्धि जगताई॥
चंद्रघंटा की ध्वनि सुनावे, हर डर-दुःख मन से मिटावे।
धर्म ध्वजा जब ऊँची होई, तम से जूझे, विजय सँजोई॥
कूष्मांडा अति दीन-दयाला, ब्रह्मांड रचैं, भगाएँ जंजाला।
अद्भुत रूप ठाना तुमने, सब संकट के मूल जलाए॥
स्कंदमाता ममता भारी, जो माँगै वो दूँहि तू उबारी।
सुख-समृद्धि बरसावै अम्मा, संतान हित की नैया खैवा॥
कात्यायनी तेज उजागर, दुष्ट दलन में सिद्ध अकादर।
शौर्य-धैर्य का पाठ सिखावै, मानवता पर बल बरसावै॥
कालरात्रि महाभय हारी, रौद्र रूप ममता भी प्यारी।
रक्तबीज जइसे दानव मारो, पलक झपकते भ्रम सब टारो॥
महागौरी गौरा उजियारी, निष्कलंक ज्यों शुभ कुमारी।
भक्ति करे जो मन से नित, मिटे पाप, सुख की फुलवारी॥
सिद्धिदात्री गुन की खान, जगमग करत तिहुँ लोक विहान।
रिद्धि-सिद्धि की हो वैभव धारा, साधक पे माँ नेह तुम्हारा॥
रूप अनेक तुम्हारे माय, जब भी पुकारे भक्त अघाय।
सकल बिपत हर लैहु तुम भैया, निष्चय कर सेवत गुरुआइया॥
मोह पटल जब मन पे छाए, ग़लत पहचान हमें भरमाए।
सच्चा रूप पहचाने जोई, अंतर-आनंद वही सुख होई॥
सुस्ती तज के कर्म में जागे, मन के आलस दूर अभागे।
पहला डग बस चाल बदलना, सेवा-मार्ग में मन को ढलना॥
दूजे पग में निःस्वार्थी बन, जगहित के अनुराग में तन।
फल की इच्छा बिन जो धावे, गंतव्य को वह सहज ही पावे॥
तीसरे पग अंतस को देखे, सत्य-स्वरूप में मोह न भटके।
तब निज आनन्द प्रकटी होई, जो हर कष्ट से मुक्ति दिलोई॥
त्रिगुण-माया ते ऊपर उठना, महाकाली की छाया सुठना।
ज्ञान-दीप जब भीतर जलता, तम का हर बंधन यूँ गलता॥
निर्लिप्त भाव जो रखे नित, दुनिया का बंधन तजिहै चित।
माँ की कृपा से साधक जीते, नाशे दुख, सब आसें रीते॥
राम-शिव भी मैया के वंदक, आदिशक्ति के सब अनुबंधक।
सेवा-प्रेम से अग्नि जलती, द्वेष-नफरत सब जाती टलती॥
करूँ स्तुति जगदंबे तेरी, कृपा तिहारी मुझ पे भरी।
राही के कारज सफल बनाओ, भवसागर से पार लगाओ॥
नवदुर्गा महिमा अति भारी, सुनत हृदय में जोत पुकारी।
पाठ करे जो मन बस नित, माँ कृपा से हो भव-हित॥
समाप्ति दोहा
नवदुर्गा चालीसा जो, प्रेम सहित नर गाए।
माँ वारी हो संकट हरे, जीवन में सुख आए॥
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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