ए ख़ुदा! उनकी यादों को दिल से निकाले,
या फिर मेरी जिगर की आग को बुझा दे।

रात की ख़ामोशी में उसके हुस्न की बात हो,
रेशम की चादर से, ना फ़रमानी को छिपा दे।

दरिया की खामोशी में उसके शब्द छुपे हों,
न हो वो तो हर कोना कोना अँधेरा कर दे।

तेरे बिना जिंदगानी के रंग फीके लगते हैं,
तेरे आने से हर सुबह को सुनहरा कर दे।

सपनों की जमी हुई रेत पर उसके नक़्श हो,
उसके बिना हर एक ज़र्रा धुंधला कर दे।

दिल की गहराइयों में छुपे हैं उसके किस्से,
उसकी यादों को हर लम्हा तरसता कर दे।

तेरे बिना तो बेताबियाँ भी चुप रहती हैं,
तेरे आने से हर दिल को सजदा कर दे।

रात की चाँदनी में उसकी हँसी की आहट हो,
वो लम्हा हर याद को फिर हराभरा कर दे।

फूलों की खुशबू में उसकी महक बसी हो,
उसकी कमी को हर ख्वाब में ज़िंदा कर दे।

तेरे ख्यालों में खोया दिल बेताब रहता है,
तेरे बिना हर सांस को वीरान कर दे।

उसके चेहरे की रौनक को न खोने देना,
उसके बिना हर झलक को फीका कर दे।

दिल की जहां में उसकी तलाश चलती है,
तेरे आने से हर दर्द का रास्ता भुला दे।

तेरे बिना वक़्त की चमक तो गुम है,
आये तो हर नफ़्स को ख़ुशगवार कर दे।

~ Rajesh Kuttan “manav”

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?