किस्मत का खेल, ये ज़िन्दगी की बात
मन की डगर में, खोया हुआ धुंध
अभी क्या मैं हूं ज़िंदा, या बस ख्वाबों में बंद
रात की चुप्प में, दिल की धड़कनें फुसफुसाती हैं,
सपनों की माया में, सच्चाई तन्हाई की कराह सुनाती है।
जिन्दगी की सच्चाई, कितनी बेतरतीब और अजीब,
उम्मीद की किरणें, पर हकीकत की दीवारें इतनी घनीभूत।
आंसुओं की बूंदें, स्याह आकाश में लहराती हैं,
भूल की चादर, हर सच्चाई को छुपाती है।
खोए हुए लम्हे, समय के दामन में बिखरे,
क्या ये दर्द भरी रातें, सिर्फ फसानों में ही कहे जाएँगे?
आत्मा की गहराई में, शोर सा सुनाई देता है,
खुद से लड़ता इंसान, कब अपने को पहचान पाता है।
स्वप्नों की चादर में, कितनी बार ठुकराया है खुद को,
सपनों की हार और जख्मों की माटी, यही तो है जीवन का योग।
क्या यहाँ भी कभी सुकून की सुबह आएगी?
या इस गहरी रात की चुप्प, इसी में समा जाएगी?
सपनों का चक्रव्यूह, क्या कभी टूटेगा?
या दिल की गहराई में, यह गहरा दर्द ही लहराएगा?
रात के अंधेरों में, उम्मीद की एक किरण बुनता,
क्या सचमुच खुद को जानने की ख्वाहिश कभी पूरी होगी?
खुशियों की बुनाई और दर्द की ये सच्चाई,
क्या इन्हीं ख्वाबों की दुनिया में, खुद को खो देने की नियति है?
~Rajesh Kuttan ‘manav’

Leave a comment