2024 का यह वर्ष बहुत ही अनोखा सिद्ध हो गया जब भारतीय राजनीति में एक अजीब घटना हुई। महाभारत के काल में मशहूर राजनीतिक योद्धा, हस्तिनापुर के पुराने सिंहासन का अधिकारी दुर्योधन, अचानक से 2024 में वापसी कर गए।

दुर्योधन का आगमन ही एक बड़ी चुनौती बन गया। उनकी आँखों में वो खटकता विश्वास था, जैसे उन्होंने अपने दुर्योधन के समय में भी दिखाया था। उन्होंने देखा कि समय बदल गया है – अब बटुए में बटुआ और धनुष बजाने वाली सजग सेना के बजाय आधुनिक राजनीतिक योद्धाओं की दौड़ रही है।

उन्होंने अपने समय की तुलना में वर्तमान के युद्धिष्ठिर को देखकर हंसी नहीं रोक पाई। वे खुद को व्यापारी और धर्म के समर्थक के रूप में देखते थे, जबकि युद्धिष्ठिर और उनके समर्थक तकनीकी और नई आयुधों से युद्ध करने की बात करते थे।

एक दिन दुर्योधन और युद्धिष्ठिर के बीच एक विवाद हुआ। दुर्योधन ने कहा, “अरे भाई, तुम्हारे युद्ध के युग में तो अद्वितीय युद्ध करने के लिए सिर्फ तकनीकी ज्ञान ही काफी होता है। हमारे युद्ध में तो धर्म की बात थी, विश्वास की बात थी, आत्मा की बात थी!”

युद्धिष्ठिर ने उत्तर दिया, “भाई, धर्म की बात तो अभी भी हमारे यहां चलती है, लेकिन अब उसे संविदान और कानून से बांधा गया है। और हाँ, युद्ध भी अब तकनीकी और राजनीतिक ज्ञान पर निर्भर करता है, ज्यादातर व्यापार ही होता है!”

दुर्योधन के चेहरे पर एक ख़ुशी और विचारमय स्वागत हो गया, उन्होंने दिलचस्पी से युद्धिष्ठिर की बात सुनी। उन्होंने फिर सोचा, “अच्छा है, इस युद्ध में कुछ नया है। मुझे भी इसमें एक बार प्रस्तुती देनी चाहिए!”

और इसी तरह, दुर्योधन और युद्धिष्ठिर के बीच के विचारमय वाद-विवाद ने नए युद्ध की अद्वितीय ताकत और विचार दिखाया। सबके होंटों पर हंसी थी, क्योंकि यह महाभारत के युद्धिष्ठिर और दुर्योधन की अनूठी मुलाकात थी, जो अब आधुनिकता की दुनिया में बड़ी ही हंसीले अंदाज में खुली थी।

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

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