आजकल की राजनीति और इसकी अनिश्चितता को लेकर बहुत सारे मुद्दे हैं। लेकिन उनके बावजूद हम यहां हास्य से भरपूर तरीके से बात करेंगे, क्योंकि हंसी ही है जो हमें इन समस्याओं से ऊपर उठा सकती है।

अनिश्चित राजनीतिक मनोवृत्ति

राजनीतिक अनिश्चितता का यह कारनामा कहां से शुरू हो? शायद इसमें हमारे नेताओं का खास योगदान है। जैसे ही एक पार्टी का नेता बोलता है “ये हमारा प्लान है”, दूसरी पार्टी का नेता बोलता है “नहीं, ये हमारा प्लान है”। और फिर तीसरी पार्टी बोलती है “ये प्लान हम सबका है”। यहां तक कि अनिश्चितता की नई मिसाल बन गई है। जब तक ये सब अपने-अपने प्लान पे अड्डे रहेंगे, हम अपने दिल्ली से ती गिनती करते रहेंगे कि “अब कौन सी पार्टी हमारे बेहतरीन फ्यूचर का सपना दिखा रही है?”।

अशिक्षितता: एक स्मार्ट दुनिया में

अब हम आते हैं हमारे अशिक्षित मुद्दे पर। बिना पढ़े-लिखे लोगों के हाथ में इन्टरनेट की शक्ति, ये ठीक नहीं। यहां तो लोग इतने ज्ञानी हो रहे हैं कि गूगल भी उनकी सोच से पिछली रेल पे है। अगर बिहार में चार मिनट में नेताओं को डिग्री मिल सकती है, तो दिल्ली में लोग एक घंटे में यूट्यूब से डिप्लोमा हासिल कर लेंगे।

फेक नैरेटिव: सच्चाई की बात

और अंत में आता है हमारा फेक नैरेटिव। जब तक व्हाट्सएप पर एक बटन नहीं आता कि “सत्य की डिफिनिशन के लिए ‘सर्च करें’ दबाएं”, हम सब चाय के कप पे नाम लिख के नहीं बैठेंगे। अब इस अनिश्चितता में भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शान है कि हम खुद भी कह सकते हैं, “अबे भाई, ये सब छुट्टा प्लान है, आराम से जियो!”

विवाद और उससे बचाव

राजनीतिक अनिश्चितता और अशिक्षितता के चक्कर में हमारी जेब में एक और खतरा घूम रहा है – विवाद। ये विवाद तो इतने तेजी से हो रहे हैं कि लगता है, गूगल मैप्स भी कहीं छूट रहे हैं।

एक तरफ हमारे नेता बैठे हैं, तो दूसरी तरफ हमारे सोशल मीडिया वारियर्स हैं। नेता बोलते हैं “हमारे देश में बड़े बदलाव आएंगे”, तो सोशल मीडिया पे “इसे क्लिक करो, इसे शेयर करो” के बदले “रोटी के टुकड़े मिलेंगे” की नींव रख रहे हैं। और फिर जब दोनों तरफ की भिड़ंत होती है, तो लोग सोचते हैं कि, इस सब की जगह एक अच्छा ड्रामा देख लें।

लेकिन हमें इस विवाद से बचना भी आता है। सबसे पहले तो इसे स्वीकार करना होगा कि देश के अंदर हम सब एक ही खाता हैं – भारतीय होने का। अगर हम सब एक जैसे लगे तो विवाद तो लगातार होंगे, पर हास्य के इतने दीवाने होंगे कि एक डबल कॉमेडी शू भी बना सकते हैं।

दूसरा तरीका ये है कि हम सब ठीक-ठाक आदमी हैं। हमारी मांगे भी उतनी ही ज्यादा नहीं हैं जितनी की एक नेता की अपनी पार्टी के लिए आवाज़ उठाने की। इसलिए जब तक वो समझें और हम समझें कि हम सबका फायदा तब होगा जब हम सब मिलकर काम करेंगे, तब तक विवादों की बरसात से बचने के लिए बाकी सब तय कर लें।

समाप्ति

इस तरह हास्य और ज्ञान से भरपूर विचार आपको यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि भारत की राजनीति और इसकी अनिश्चितता को हम अपने हास्यव्यंग्य के माध्यम से भी समझ सकते हैं। आखिरकार, हंसी के बिना इस सब की रस्सी भी बांधी नहीं रह सकती। उम्मीद है आपको यह लेख पसंद आया होगा और आपके चेहरे पर भी एक मुस्कान ला सका होगा।

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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