रस्साकशी: बायां, दाएं और मध्य की राजनीतिक लड़ाई

भारतीय राजनीति में जिस तरह की नई युद्धभूमि खुद को दिखा रही है, उसमें रस्साकशी का नया दौर आरंभ हुआ है – बायां वाले बनाम दाएं वाले और मध्यवर्ती में! इस नए खेल में, जीत और हार बस नतीजे के अलावा कुछ नहीं हैं।

सोचिए, एक ऐसी स्थिति जब एक चुनाव में जीतने वाला हार जाता है, और जो हार गया वहां धूमधाम से अपना जीत  मनाता है। हां, आपने सही सुना – ऐसा अद्भुत मोड़ नई राजनीतिक कॉमेडी का है!

नरेंद्र मोदी, जो हमेशा ताकत के स्वाद में रहते हैं, इस चुनाव में जीत कर हार गए। उनके चेहरे पर थोड़ा सा शर्म और बहुत सी ग़ुस्सा दिखाई दे सकता है, लेकिन उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के मन में उनकी गर्वित चित्र अभी भी बरकरार है। वे अपने विरोधियों की तारीफ़ भी कर सकते हैं – “कम से कम वे हमेशा इतने बुरे नहीं थे जितने हम उन्हें बताते थे!”

राहुल गांधी, जो अक्सर हास्य के रस में डूबे रहते हैं, उसे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ ख़ुशी-ख़ुशी चलते और  नाचते हुए देखा जा सकता है। उनके चेहरे पर खुशी का झलक होगा, जैसे वे एक विजय का महसूस कर रहे हों – “देखो, हम भी कभी-कभी जीत सकते हैं!”

मध्यवर्ती राजनीतिज्ञ, जो हमेशा सब को बेवकूफ बनाने की कोशिश में रहते हैं, अब बेहद खुश होंगे क्योंकि उन्होंने रस्साकशी में अपना स्थान बनाया है। उन्हें कहते हुए देखने में मज़ा आएगा, “जीतते है  हारते हैं, लेकिन हारने में जीत ढूंढ लेते है यह भी अद्भुत बात होती है!”

इस राजनीतिक नाटक में, हंसी के साथ थोड़ी सी सचाई भी छिपी है। यहाँ ज़िन्दगी हर कदम पर रस्साकशी हो रहा है, और जीत और हार एक खेल की तरह बदलते रहते हैं। चाहे वो बायां हों, दाएं हों या मध्यवर्ती, सबका है अपना अलग ही मज़ा!


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