शिवाय नमः, शिवाय नमः,
कालचक्रे नवीनचरित्रणे।
ब्रह्माण्डव्याप्तिसमये विलये,
सृष्टिस्थित्यादौ तव सार्वभौमे॥

रुद्राय जटाधराय, नीलकण्ठाय चारुविग्रहाय।
नागेन्द्रहाराय पिनाकहस्ताय, नमो नमः शिवाय॥

सर्वेश्वराय महेश्वराय, जगद्योनये वीरभद्राय।
सम्हारकर्त्रे त्रिपुरान्तकाय, नमो नमः शिवाय॥

नीलगङ्गाधराय त्रिपुरारिहाय,
गौरीपतये साशिषेकधारिणे।
जटाधराय पार्वतीपतये,
नमस्ते रुद्राय विभुषिताय च॥

सृष्टिकर्त्रे त्वं जगतां पतये,
विष्णुस्त्वमेव स्थितिकर्ता च सः।
रुद्राद्यानि त्वं प्रलयानि च,
त्वं हि महेश्वर जगत्पतिः सः॥

नीलकण्ठो भस्मविभूषितोऽसि,
गंगाधरो यज्ञभुक्तिवर्धनः।
सर्वलोकप्रिय जगत्पते त्वं,
नमस्ते शिवो नगजाय च॥

नीलग्रीवाय च विषादहारिणे,
सर्वायुधोपेत नमो नमः शिवाय।
अशेषवन्द्याय त्रिनेत्रधारिणे,
जटामण्डिताय नमो नमः शिवाय॥

कालाय रुद्राय नित्यशान्तिदाय,
व्योमकेशायाखिलदेहिनां पतये।
सृष्टिस्थितिप्रलयकारणाय,
नमो नमः शिवाय त्रैलोक्यनाथाय॥

सृष्टिर्मया त्वयि विलीयते च,
जीवो जगत्त्वं त्वयि सञ्चरामि।
प्रलये त्वयि त्रिभुवनेश्वरे,
नमो नमः शिवाय देवराजाय॥

विश्वेश्वराय जगदेकपालकाय,
नीलकण्ठायाखिलदेवदेवाय।
सर्वेश्वरायाखिलभूतभावनाय,
नमो नमः शिवाय सदाशिवाय॥

सृष्टिर्मया त्वयि विलीयते च,
ब्रह्मादयो ये पुनरुत्पन्नभूतिम्।
त्वं त्रायसे त्रिगुणात्मकं जगत्,
नमो नमः शिवाय त्रिगुणात्मने॥

अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय,
व्योमनाथाय नमो नमः शिवाय।
कालात्मकाय कल्पकान्तिधारिणे,
नमस्ते शिवाय कृपाकराय च॥

शिवाय नमः, शिवाय नमः,
कालचक्रे नवीनचरित्रणे।
ब्रह्माण्डव्याप्तिसमये विलये,
सृष्टिस्थित्यादौ तव सार्वभौमे॥

– राजेश कुट्टन्

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Get the Book

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

Be Part of the Movement

Every week, Rajesh shares new blogs, fresh perspectives, and creator spotlights—straight to your inbox.

Go back

Your message has been sent

Warning

इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?