भैरवस्य तन्त्रभेदं चिदानन्दरसोपमम्।
सृष्ट्यादौ विनशंस्तारं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

कराग्रेण शूलेन्दुष्टं दमरुणा धुनि मन्दितम्।
सृष्टिस्थित्यन्तकारणं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

मृदुपाणिं त्रिनेत्राभ्यां शशिधरं भस्मभूषितम्।
महाकालं मृगाधीशं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

वामभागे वक्षस्थले रुद्राक्षमालिकाधृतम्।
देवदेवं जगत्पतिं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

कटिभारं त्रिपुण्ड्रं च नीलकण्ठं विभूषितम्।
कपालमालिकाधारं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

सर्वाभरणभूषितं जटामण्डलधारिणम्।
नटराजादिरूपेण भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

विशालाक्षं विशालाक्षं स्फटिकाभं जटाधरम्।
धनुर्बाणायुधं शूलं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

सर्वशक्तिधरं देवं सर्वार्तिहरणं परम्।
सर्वज्ञं सर्वभूतानां भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

त्रिकालाभ्यां त्रिनेत्राभ्यां त्रिगुणात्माभ्यां च सर्वदा।
भूतात्मानं प्रणम्याहं भैरवं वंदे सदा शिवम्॥

शिवं शक्तिं च भैरवं स्वरूपं शान्तरूपया।
नमामि भैरवरूपं तं त्रिभुवनपालकम्॥

जयंतं विजयंतं वामदेवधरं मृगाधीशं।
कपालिमकुटाद्यैर्भैरवं नमामि सदा शिवम्॥

  • Rajesh Kuttan

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?