एक माया है जग
खुद में ख़ोया है जग
एक साँस है सब
खुद में रवाँ है सब
एक मुसाफ़िर है वो
खुद में सफ़र है वो
एक मक़सद है हम
खुद में खोजते है हम
एक समंदर हु मैं
खुद में डूबा हु मैं
एक पहेली है तू
खुद में उलझी है तू
– राजेश कुट्टन ‘मानव’
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Hi, I’m Rajesh Kuttan. I write about creativity, process, and building a life around making things.
एक माया है जग
खुद में ख़ोया है जग
एक साँस है सब
खुद में रवाँ है सब
एक मुसाफ़िर है वो
खुद में सफ़र है वो
एक मक़सद है हम
खुद में खोजते है हम
एक समंदर हु मैं
खुद में डूबा हु मैं
एक पहेली है तू
खुद में उलझी है तू
– राजेश कुट्टन ‘मानव’
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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|
प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?
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