पंख नही है फिर भी उड़ रहा हु
बंद आँखों से ये क़्या क्या देखा रहा हु
हर कोने में मेला लगा है
कही ठेला तो कही झूला लगा है
कोई खेल करतब का,
कही खुश्बू शर्बत क़ी,
कही आशिक़ों की जमघट है
कही अल्हड हुस्न की आफत है
कितने किस्सो का हिस्सा रहा हू
क़भी भीड़ में तो कभी तनहा रहा हू
कोई स्नेह मतलब का
कही ऋण पर्वत सा
कहीं दोस्तों की टोली है
कही सुनसान होली है
बंद आँखों से ये क्या क़्या देखा रहा हु
पंख नही है फिर भी उड रहा हूँ
राजेश कूट्टन “मनाव”

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