खुशबुओं से भरा है कमरा मेरा,
जाने क्या छु गए हो तुम।
अभी तक याद आते हो,
जाने क्या कर गए हो तुम।
मीलों चला फिर भी वही के वही रहा,
जाने क्या बांध गए हो तुम।
किताबें लिख डाले तुम्हारे किस्सों के,
जाने क्या सुना गए हो तुम।
सब को रोक रोक के पूछते है
जाने क्या कह के गए हो तुम।
हवाओं में रंग शराब का घुला है
जाने क्या पिला गए हो तुम
कैद में भी रौशनियों की बारिशें है
जाने क्या जला गए हो तुम।
अब मुझ में आग है न चिंगारी
जाने क्या राख कर गए हो तुम
इंतेज़ार भरा है आखों में बस
जाने क्या धुंआ कर गए हो तुम
राजेश कुट्टन ‘मानव’
Leave a comment