गीत है, ग़ज़ल है, अफसाना है जिक्र में
महफ़िल में, क्यों बताये, वो राग क्या है
खामोश ही अच्छे अपने जेहन के पिंजरे में
अब किस किस को सुनाये के हाल क्या है
शाम है, सेहर है, सफर है नज़र में
इबादत में, क्यों बताये, के मिला क्या है
रुके हुए ही अच्छे, यादों के खनक में
अब किस किस को बताये के खुदा क्या है
गुलाब है इत्र है, रूह है खुशबुओं में
जनाज़े में, क्यों बताये, वो महक क्या है
बंद ही अच्छे अपने जिस्म के कैदखाने में
अब किस किस को बताए के हम क्या है
राजेश कुट्टन “मानव”

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