अब घर अख़बार नहीं आता

शाम तक तू थका देती है ज़िंदगी
रोज़ रोज़ कहा से हौसला लाऊँ
निशानियाँ सब दुँधली पड़ रही
कहानियाँ अब नई कहाँ से लाऊँ

संग अब किसके बैठे और बातें करे
चाय बिस्कुट के साथ राग कहा से लाऊँ
खबरे जैसे अब फिर दोहराने लगे
किरदार वो पगले अब कहाँ से लाऊँ

सूखे पेड़ सी हो गई है सुखद स्मृतियाँ
नए गुलाबी चेहरों पर प्यार कहाँ से लाऊँ
दिन एक सोफे में बीत जाता है अब मेरा
कंधों पर उठा कर ले जाए ऐसे यार कहा से लाऊँ

‘मानव’ राजेश कुट्टन


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