विरह की गहरे झील में ,
नहाएं कई बरस
उड़ गए सब पँछिया,
रह गए सिर्फ दरस
अंतहीन इस झील में
कब पार पाऊंगा सखी
इन अंधेरो को देख सकू
ऐसे भरम के चमशे ला दो
किसी बहाने ही सही, फिर
उसे मेरे नज़दीक ला दो
गिन रहा हु दिन अभी,
सोच कर तुम आओगे कभी
कब मेघ आया,
कब रौशनी,
ज़रा भी कुछ बोध नहीं
तुम आये,
तुम आ कर थोड़ा रुके,
कुछ देर आराम मिला ।
क्या किसी ने चूमा तुम्हे?
क्या तितलियों ने राग बुने?
क्या पिले रंगों के महकते फूल खिले?
या वो सिर्फ मेरी जेहन में उगे!
विरह की उस झील से निकल रहा हु अब
जिस्म से तुम्हरे स्नेह के इत्र उड़ा रहा हु अब
सवाल सारे फुर्र हुए
जवाब सारे मिल गए
शून्य सा मन हुआ
सूर्य सा तन हुआ
यह कैसा भरम हुआ
जाने कैसे चश्मे मिल गए
अंतहीन इस झील मे
अब पार पा रहा हु सखी।
राजेश कुट्टन ‘मानव’

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