पशेमान

तुलसी के पत्तो को हाथो में रगड़ना
मुझे बहुत याद आता है तेरे झगड़ना
रहते थे सारा दिन गुमसुम बेखबर
वो बेवक़्त रोकना वो बेवजह छेड़ना

सब झूठे एक तू ही सच्चा लगता रहा
सब छोड़ कर तू मुझ से लिपटा रहा

टिफ़िन के ड़िब्बे को आहिस्ता पकड़ना
मुझे बहुत याद आता है तेरा मुझे ढूढ़ना
खेलते थे सारा दिन रहते इधर उधर
वो खाने को पूछना वो जिद्द से खिलाना

सब रह गए साथ, तू किधर गुम हुआ
सब उज्जले अंधेरो में, तब्दिल हुआ

छत को कागज़ और थर्मोकोल से सजाना
तेरे सब निशानिया दिवार पर चिपकाना
अंधेरो में यादो की जुगनु जैसे जलते रहे
वो रातो को सपनो की दुकाने लगाना

राजेश कुट्टन “मानव”


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