मृत्यु

मृत्यु अटल सत्य है, और हर सत्य की तरह यह भी असहनीय होता है| सृजन और काल जैसे धूप और साया, जैसे रात और दिन, एक के बिन दूसरे का अस्तित्व नहीं और एक के गुजर जाने के उपरान्त अगले का उदय निश्चित| पर कितना आसान है यह उस वक़्त समझना जब मौत किसी अपनों को दस्तक दे? उस वेदना को कोई किन शब्दों में वर्णन करे!

बरसो बात न हो, मुलाकात न हो, पर यह एहसास के कभी तो मिल लेंगे, कभी तो बात हो जाएगी, सब एक पल में कितना झूठमूठ हो जाता है जब उसके न होने की खबर मिले| एक ऐसा रिक्त भर जाता है पुरे शरीर में, मानो उनमे रक्त नहीं हवा दौड़ रही हो| एक पल के लिए जैसे लगता है कोई खेल चल रहा हो और यह क्षण भर के लिए रुक गया हो| अभी सब ठीक हो जायेगा, अभी वो उठ कर कहेगा के “अब तेरी बरी”|

हा, मृत्यु एक पड़ाव है, मालूम नहीं के मर के कहा जाते है, लेकिन जो रह जाते है उनकी अगली सुबह बिलकुल अलग होती|  कुछ भी वैसे नहीं रहा जाता, सब कुछ बदल जाता है | जो हर वक़्त समीप था, पास न हो कर भी हर गम और हर ख़ुशी में शामिल था, उसका यु बिना अलविदा कहे चले जाना, उन आखिरी पल में साथ का न होना, जैसे हज़ारो अनकहे बात छुपा कर सो जाना, कैसा अजीब यात्रा का अंत है| जिन्हे पलकों में रखा और दिलो में आशना दिया उन सब को झांझोट कर, अधमरा छोड़ कर, ऐसा कौन जाता है?

 


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