लोकतंत्र की शुद्ध परिभाषा है “लोगो का शासन” “लोगो के दुवरा” “लोगो के लिए”, किन्तु आधुनिक लोगतंत्र में राजनीति का बोलबाला है| कितना विरोधाभास है के लोकतंत्र में आज भी “राज” निति मौजूद है, इसका खत्मा तो राजशासन के साथ खत्म हो जाना चाहिए था पर आज भी यह गाजे बाजे के साथ पुरे राजशी ठाटभाट में मौजूद है|

जहां २३.६% जनता गरीबी रेखा के कोसों दूर नीचे जानवरो सा जीवन व्यतीत करता है और ६०% जनसँख्या गरीबी रेखा में अपना गला घोट कर जैसे तैसे निर्वाह कर रहे वहीं हमारे जन सेवक राजमहलों में रह रहे है| हर विधायक की कोठी भारतीयों को जैसे मुँह चिड़ा रही हो, कह रही हो मनो तुम्हे कैसे हमने बेवकूफ बना रखा है, ऐसे उलझा के रखा है के अपने हको को ही भूल चुके हो| लोगतंत्र की आड़ में आज भी राजशाही चल रही है|

जब जब अकर्माणकर्ताओं ने देश पर कब्ज़ा किया, उन्होंने न केवल सम्पत्ति लुटती बल्कि अपनी व्यवस्तओं और विश्वासों को जनमानस पर बलपूर्वक थोपा; सार्वभौमिक नियम के अनुसार ऐसा करने से शासन की अवधी लम्बी होती है| किसी भी राजवंश का इतिहास यही कहता है भले वो किसी भी विचारधारा से प्रभावित क्यों न हो|भले वो सम्राट अशोका हो, या मुग़ल, अँगरेज़ इत्यादि सब ने मूलनिवासियो को अपने जैसा बनाने की कोशिश|

१९४७ के बाद कांग्रेस ने लोगतंत्र के आड़ में अपनी व्यवस्ता करीब ५६ साल चलाई| अँगरेज़ हिन्दुस्तानियो को अपने जैसा बनाना चाहते थे ताकि वो उनकी सेवा ले सके और कभी हद तक वो कामयाब भी रहे, कांग्रेस ने दो कदम और आगे बढ़ कर काम किया, ऐसे लोग तैयार किये जो न केवल सरकार की सेवा कर सकते है बल्कि पूरी दुनिया में सस्ते पढ़े लिखे मज़दूर उपलब्ध करा सकती है| कांग्रेस ने सेक्युलर नाम की मृत्यु व्यवस्ता को जन्म दे कर बहुमत में बैठे हिन्दुओ के अधिकारों को सरसैया में लिटा दिया|

राजव्यवस्ता डरा कर स्थापित की जाती है, कांग्रेस ने भी डर को आधार बना कर शासन किया, जन संगठित हो जाए तो जनशक्ति बन जाती है, १९४७ के बाद के सरकारों ने हमेशा कोशिश की कि जनशक्ति का उद्गम न हो, वो हर जगह बंटे रहे|

आज जब मोदी सरकार का शासन चल रहा है, यहां भी हमें वही व्यवस्ता नज़र आती है| बीजेपी और संघ की अपनी विचारधारा है और बरसो से रही है, इसमें कुछ गलत नहीं| विचारधारा गलत तब होने लगती है जब श्रेष्ठा का भाव आ जाए, उन्हें लगने लगे वो सब से उचित है और अनिवार्य है|

लोगतंत्र का केंद्र जन होता है, लेकिन ७१ साल का अनुभव कहता है के यह एक छल है और इसकी आड़ में राजशाही चल रही है|वो दिन अब ज्यादा दूर नहीं जब इस लोगतंत्र का विनाश स्वयं जन करेगी| नई व्यवस्था के जन्म का समय ७१ साल पहले ही निकल चूका है|

आज इस संचार क्रांति के दौर में भय और असमंजस की स्थति उत्पन करना और आसान हो गया है, सरकारे कामकाज से ज्यादा सोशल मीडिया और टेलीविशन में ध्यान केंद्रित कर रही है, ४ झूठी बाते कहो कम से कम २ तो लोग सच मान ही लेंगे| आजतक नेताओं ने गरीबो को उलझा कर शासन किया, अब सोशल मीडिया के द्वारा पढ़े लिखो को भी अशिक्षित कर रहे है|आज पूरा राष्ट्र कैसे राष्ट्रवादी लहर में बट गया है| हर कोई अपने को दूसरे से ज्यादा देशभक्त दिखाने को आतुर नज़र आ रहा है और दूसरा इस भय से मर रहा है के कही उसे देशद्रोही न साबित कर दे| भारत एक महान देश है, यह कोई क्रिकेट टीम नहीं है के भारत के अस्थ्तीव के लिए समर्थन की जरुरत पड़े| और तो और जाने कैसे कैसे तर्क दिए जा रहे है मानो कोई विदेशी आकर्मण होने वाला हो, दुनिया का चौथा सब से बड़ी सेना और नुक्लेअर पावर वाले देश में यह तर्क निर्थक और गुमराह करने वाला है|

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?