मित्रो

जीने के लिए सदियों के सदमात से गुज़रे
हम दिन के उजाले के लिए रात से गुज़रे

ज़िन्दगी इस तेज रफ़्तार से गुजरी के कुछ जानने और समझने का मौका ही नही मिला। अंधेरो ने कुछ ऐसा किया के कुछ नज़र नही आया और रौशनी ने आँखे चोन्दीय दी। इस अन्धादुन्ध चक्रव्यूह में कही खो दिया खुद को मैं। इतने बिखरे के समेटने का होसला ही बौना हो गया।

आज जब किनारे बैठ कर सोचता हु की यह दौड़ किस लिए थी तो उसका जवाब मेरे नाकामी मुझे मुस्करा कर देती है। ऐसा नही के जो मिला उसका कोई अफ़सोस है, पर इसका मलाल जरूर है के गर आँखे खुली रहती तो शायद खुद को बेहतर ढंग से दुनिया को पेश कर पाते।

ये कहना अभी जल्दीबाज़ी होगा के कितना परिपक्व हुए लेकिन अपने को समझने का सिलसिला चालू तो हुआ है। मंज़िल तो आज भी अपने हथेली में ही कही छुपी बैठी है मगर अतीत सफ़र की डोर हाथ में रखने का हुनर सीखा गई।

कल का दिन फिर अनगिनत संभावनाओ के साथ आएगा, अपनी आँखे खोलो और समेट लो अपने बाहों में के शायद यही एक दिन है जिसकी फिर सुबह हो न हो।

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?