Locked withinबहुत दिनो की बात है, किसी शाक पर एक तोता रहता था| उस नामुराद की मुराद आसमानों को छूती थी| चीलो ओर बाजों से पंगे लेने के सपने देखना उसका पसंदीदा काम था| होसला उसका एक डंगाल से दुसरे डंगाल तक जाने का भी नही था पर नज़र उसकी बादलो पर थी| इस फितूर मे वो ऐसा उलझा के अपने आस पास के माहोल से बेखबर रहा| यह सिलसला दिनों दिन चलता रहा और ऐसा भी दिन आया के वो तोता खुद को एक ताकतवर बाज़ समझने लगा| उसे लगने लगा के वो इस पेड़ मे कैद है| किसी ने उसे तोते के नकाब मे डाल कर पेड़ से जकड दिया है| बाज़ वो था नहीं ओर जो हुनर उसका अपना था वो भी अब वो भूल चूका था|

कही न कही हम सब की कहानी उस तोते जैसे है| खुद की पहचान करने के बजाये हम ख्वाहिशें को पंख देने लगते है| ख्वाहिशें कही भी गलत नहीं है, यह ख्वाहिशें ही है जो इंसान को मंगल तक का रास्ता देखा रही है| गलत है गलत की ख्वाहिशें रखना, कही ऐसा नो हो जो माँगा हो वो मिल जाये फिर क्या करेगे? उसका साथ कैसे रहेगे?

आप को आपकी खबर नही फिर सपने पाल कर क्या करोगे | जब हमको ये ही नही मालूम के खुद के साथ क्या करना है फिर सपने अगर सच हो जाये तो उनके साथ क्या करोगे|

गर हौसला हो तो खुद के तलाश मे निकलो|

मैं ही सफ़र मैं ही कठिनाई मैं ही हु हम साया, सारा जग व्यर्थ गया जब खुद से ही न मिल पाया  ~ राजेश कुट्टन

One response to “खुद की कैद मे मैं |”

  1. अक्सर यूँ भी हुआ है तोता बाज़ बन गया है। अल्बर्ट आइंस्टीन जैसों ने साबित किया है। फर्क है बस इस बात की कि जिसने सपनो को इरादों में बदला वो फिर वो रहा नही। तोता बाज़ बन गया और बाज़ बादशाह।

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?