रगों में दौड़ता लहू अक़्सर ये कह रहा है,
किस कैदी-ए-ख़्वाब को दिल में छुपा रहा है।
ये धड़कनों की साज़िशें कुछ और कह गईं,
ये जिस्म सोचता रहा, दिल कुछ बना रहा है।
नज़र के पार कोई सुकून-ए-दौर ढूँढना,
मगर हक़ीक़तों का धुआँ राह भटका रहा है।
ये किसकी आहटें हैं जो साँसों में घुल गईं,
कि हर तरफ़ उसी का गुमाँ गूँज रहा है।
तुम्हारी याद जैसे कोई लम्हा अनलिखा,
किताब-ए-दिल में बार-बार खुल रहा है।
“मानव” सवाल करता है आईने से रोज़,
कि कौन है जिसे तू ख़ुद से छुपा रहा है।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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