रगों में दौड़ता लहू अक़्सर ये कह रहा है,
किस कैदी-ए-ख़्वाब को दिल में छुपा रहा है।

ये धड़कनों की साज़िशें कुछ और कह गईं,
ये जिस्म सोचता रहा, दिल कुछ बना रहा है।

नज़र के पार कोई सुकून-ए-दौर ढूँढना,
मगर हक़ीक़तों का धुआँ राह भटका रहा है।

ये किसकी आहटें हैं जो साँसों में घुल गईं,
कि हर तरफ़ उसी का गुमाँ गूँज रहा है।

तुम्हारी याद जैसे कोई लम्हा अनलिखा,
किताब-ए-दिल में बार-बार खुल रहा है।

“मानव” सवाल करता है आईने से रोज़,
कि कौन है जिसे तू ख़ुद से छुपा रहा है।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?