मुश्किलों में भी हँसी तो दिखानी पड़ती है
तुझको दुनिया और रौशन बनानी पड़ती है
किताबों के पन्ने तेरे बिना कुछ सूने लगते हैं
तेरा ही क़िस्सा हमको हर पल सुनानी पड़ती है
तू कहती है—“ये बीमारी बस इक पड़ाव भर होगा”
सो आँखों में नयी उम्मीद हमें सजानी पड़ती है
“माते”-सी तेरी डाँट ने आदत सँभाली अपनी
भटके क़दम तमीज़ के दायरे में लानी पड़ती है
डॉक्टर की स्याह रिपोर्ट अगर डर की छाया बने
तेरे ठहाके की तसल्ली फिर दोहरानी पड़ती है
दुआओँ का कारवाँ तेरा हाथ थामे खड़ा है
हर लफ़्ज़ में नई उमीद हमें बुनानी पड़ती है
‘मानव’ भी दिल को मज़बूती से थामे रखता है
मचलते आँसुओं को मुस्कान में छुपानी पड़ती है
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
प्रिय निकिते,
आज तक तूने हमें सिखाया है कि ज़िंदगी में “नो-एक्स्क्यूज़” नीति ही असली शौर्य है। तेरी वही हँसी, वही समय पर मिलती “माते”-वाली डाँट आज इस बीमारी से भी बड़ी है। याद रख—तू हमेशा अँधेरों को झूठा साबित करने वाली रौशनी रही है; इस बार भी हार उसी अँधेरे की होगी, जीत तेरी। हम सबकी दुआएँ, यादें और ठहाके तेरे साथ हैं। उठ खड़ी हो, उसी बेफ़िक्री से मुस्कुरा, और इस चुनौती को भी अपनी अगली “पंच-लाइन” बना दे!
प्यार और अटूट यक़ीन के साथ,
— तेरा दोस्त “राजेश कुट्टन – PR

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